Wednesday, 10 February 2021

*जाति के बीमार समाज विज्ञान से मुक्ति* part - 2

Part 2

*जाति के बीमार समाज विज्ञान से मुक्ति*

 अम्बेडकरवाद - दलितवाद  एक विचार का सूक्ष्म  खांचा है जिससे प्रभावित हो कर अनुसूचित जाति/जनजाति और अति पिछड़ी जातियां  अपने पुस्तैनी व्यवसाय को हीन दृष्टि से  देखने लगता है ऒैर इसमें रोजगार, आर्थिक उन्नति के अवसर खो देता है। यहि कारण है कि दलित, अम्बेडकरवाद को एक बीमार समाज विज्ञान कहने कि जहमत ऊठा पाया. ....
  आप दलित साहित्य या अम्बेडकर साहित्य पढ़ें, सारे तथ्यों पर गहराई से अध्ययन करे तो एक ही बात निकल कर आती है कि आप कि दुर्गति का कारण आप का गंदा व्यवसायिक पेशा रहा है....
 कहीं कोई जिक्र नहीं है कि आप के व्यवसायिक पेशा, व्यवसाय  आज बड़े- बड़े औद्योगिक रुप ले लिया है ऒैर इसका सलाना का कुल बिक्री करोड़ों में है ऒैर इस के मालिक वही सवर्ण समाज के लोग हैं जो इस व्यवसाय को लेकर आप पर व्यंग्यात्मक टिपण्णी करते थे ॥
 अपने पुश्तैनी व्यवसाय को लेकर आप ने कभी आर्थिक अध्ययन नहीं किया ऒैर ना दलितवाद अर्थात अम्बेडकरवाद आप को बताया ॥
💫: अपने कभी समझने कि कोशिश नहीं कि --
कोई रोजगार छोटा- बड़ा नहीं होता है. ...
छोटा- बड़ा हमारी सोच होती है. .......
हम अपने लगन, मेहनत के दम पर हर क्षेत्र में कामयाब हो सकते हैं. .........

सोचें, अगर -- चमार अगर चमरे के रोजगार को छोटा, घृणास्पद नहीं मानता तो -- बाटा, रिबोक,  श्रेीलेदर. जैसे ब्राण्ड के मालिक होते. ...।

नाई अपने व्यवसाय से प्यार करता तो आज सारे ब्यूटी प्रोडक्ट के मालिक होते।

तेली - अगर अपने तेल के रोजगार को हीन दृष्टि से नहीं देखता तो सारे तेल कम्पनी के मालिक तेली होते. . जैनी मारवाड़ी नहीं. ..

उसी प्रकार, अगर हम धोबी पेशा को घृणास्पद नहीं मानते ऒैर इस प्रोफेशन से प्यार करते तो सारे कलर(रंग) कि फैक्ट्री,  सर्फ, सोडा,  साबुन की जितनी भी फैक्ट्रियाँ ऒैर कम्पनियां हैं, हमारी होती । 
....... इसलिये जाति के सांचे से बाहर निकल कर पुश्तैनी व्यवसाय को व्यापार कि दृष्टि से समग्रता में देखने का प्रयास करें. ...

🌹किशन कमार लाल🌹
Mob no - 8918519132

दलितवाद - अम्बेडकरवाद एक बीमार समाज विज्ञान* part -1

Part - 1

 *दलितवाद - अम्बेडकरवाद एक बीमार समाज विज्ञान* 

कोईरी-कुर्मी , लोहार, सोनार, तेली, पासी, बढ़ई , धोबी,नाई, खटिक , चमार,भंगी, ग्वाला, गङेरिया-गौरया , कायस्थ एक पेशा था जाति नहीं ! 

हर समय-काल में  पेशेगत-वर्गीय विशेष पर टिपण्णी स्वाभविक थी । हरेक व्यवसाय का अपना एक चरित्र भी  होता है, और उससे जुड़ी टिपण्णी-व्यंग्य भी होती है ।

आज भी दारोगा, चपरासी , डाक्टर , नेता , नौकरशाही  पर अपमानजनक पेशेगत टिपण्णी व्यंग्य उपलब्ध है ।

आपके मूल जाति-ब्लड लाइन पर कोई टिपण्णी नहीं कर रहा था इसलिए बहुत ज्यादा अपमान की पीड़ा से व्यथित होने की आवश्यकता नहीं थी ।

आपने यदि अपमान की पीड़ा से समाजशास्त्र  पढ़ना शुरू कर दिया तो समाजिक विज्ञान फिर  बीमार विज्ञान बन जाता है ।

"दलितवाद-अम्बेडकरवाद"  उसी बीमार विज्ञान का नाम है ।

आपको सिर्फ दो बातें गौर करनी है ।

1) हर पेशे-वर्ग में नस्लीय विविधता कितनी है ? क्या अपमानजनक टिपण्णी की वजह नस्लीय समझ थी या वर्गीय ?

2) दूसरी यदि हम  पेशेगत समाजिक संरचना  को अपमानित कर रहे थे तो हम कहीं ना कहीं , भारत को  ही तो कमजोर कर रहे थे और किया भी हमने ।

Wednesday, 16 September 2020

रज्जुक संघ के धोबी

साज श्रृगार रुप देख कर रानी कि तरह, ,, पर सर पे पोटरी (गठरी) विस्मय मे डाल देती है ॥ जैसे कोई रानी अपने प्रजा जनो के लिये महलो को छोड उनकि सेवा के लिये जा रहि हो ॥  जैसे बता रहा हो प्रजा कि सेवा सर्वोतम सेवा ॥ एक श्रवण संस्कृती मे ना कोई राजा रानी, ,, सभी समान ॥ आज इस कुल को क्या बना दिया गया, ,,, खुद मे झाक कर देखे क्या थे क्या बन गये ॥ पर कुछ इस संस्कृती के विरोधी भेडिये आप को क्या बना दिये, ,,,? ??🌹सम्राट अशोक द्वारा बनाये गये रज्जुक संघो के कार्य निष्टा पुर्वक पुरी इमानदारी से  रजक(धोबी) आज तक कर रहे है ॥देखे अशोक ने कलिंग में कहा , “सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय को सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है ॥ *रजक(धोबी) आज भी सारे प्रजा को ना जाती ना धर्म देख कर अपने संतान कि तरह सेवा कर रहै ॥*🙏🏻....... किशन लाल🌹

Saturday, 5 September 2020

जाती कि उत्पत्ति सिद्धांत

*जातीवाद कैसे खत्म किया जा सकता है*?
आज हर बुद्धिजीवी जातीवाद खत्म करने कि बात करता है पर किसी के पास इसको खत्म करने कि सटिक ऊपाय नहि है. ... इस जातीवाद को खत्म करने का ऊपाय के रुप मे आरक्षण कार्ड खेला गया. .. क्या ये कारकर हो पाया? ??? जवाब है नहि ॥
..... आरक्षण को लेकर ऊल्टा हि हुआ जातीवाद नये रुप सर्वण वर्ग  एक जुट हो गये. ... यहाँ तक हुआ कि वर्ण सिद्धांत के सब से निचले वर्ग सुद्र (obc) भी अंत्यज वर्ग (sc) के खिलाफ हो गया ॥

लेकिन हमारा व्यक्तिगत अनुभव है कि जातीवाद खत्म तभी हो सकता है जब अंत्यज वर्ग जातीवाद के खिलाफ अपने जातीय इतिहास को मजबुत कर किया जा सकता है. .... ताकि कोई भी अपने जाती को लेकर हिन भावना नहि पालेगा ऊलट जाती को लेकर गर्व महसुस होगा ॥ भरी सभा मे अपने जाती का गुणगान, गॊैरव, का वखान कर सकते है. ... तब अन्य सर्वण समाज आप के इतिहास के सामने टिक नहि पायेगा. .. अपने मिथ्य साहित्य पर दंभ भरते सर्वण समाज का महल तास के पत्ते से बना महल आप के जातिय इतिहास के सामने भर-भरा के विखर जायेगा 🙏🏻
1) जातिय इतिहास से आप के बच्चो मे आत्म सम्मान, आत्म गोैरव कि भावना का विकास होगा ॥
2) आप के बच्चे जाती के कारण कुठा ग्रस्त नहि होगा ॥
3) आप के बच्चो का सार्वागिय विकास करेगा वो अपने ऎतिहासिक पुरुष से प्रेरणा पा कर उस कि तरह बनने कि सोचेगा ऒैर बनेगा
4) जाती तोडने के बजाय जाती मजबुत इस तरह से करने से सर्वण समाज का मिथ्य गॊैरव कांच के महल कि तरह चकना चुर हो जायेगा. .. बस एक पत्तथर  तवियत से तो उछाले ॥
5 ) .... जय धोबी वंश के कुल गॊैरव सम्राट अशोक कि जय 🌞󾴇स तरह के स्लोगन का निर्माण करे. ........ इतिहास लेखन हि अपने जातीय व्रचस्व को बनाये रखने के लिये किया जाता रहा है एक बार धोबी समाज करे. ...🙏🏻

🌞किशन कुमार लाल🌞

जाती व्यवस्था कि सच्चाई

*जाती व्यवस्था कि सच्चाई*

जातीयो कि उत्पत्ति के बारे सारे इतिहास कारो से हमारा मत भिन्न है ये इतिहास कार बहुत कुछ छिपा जाते है. ... सारे इतिहास कारो से सवाल है. .....
1) भारत अप्रवासीयो का देश है तो जितने शक, कुषाण, हुन, मंगोल,  सिथीन,  etc आये तो इन एक नस्लिय लोगो का समुह बना कर रहा तो जाती का निर्माण   धीरे- धीरे हुअा ये हमारा मत है. .... तो इतिहासकार इसे वेद, कुराण से क्यो खोजते है?
2 ) मध्य भारत का इतिहास लगातार रियासतो के जय - पराजय का रहा तो तो विजेता रहे नस्ल हारे हुए राजाऒ के सैनिक या उस राज्य मे रह रहे लोगो पर प्रतिवंध लगाये हि होगे. .... यहाॅ उत्तपादन ऒैर व्यवसाय का बटवारा हुआ हि होगा. .. तो मिथ्य के साहित्य वेद पुरान मे इस का सवाल क्यो ढुंढा जाता है. .?
3) ब्राह्मणो का समुह भी एक नस्लिय नहि है ऒैर ना इस मे रोटी बेटी संबंध होता है तो सारे जाती का ठिकरा इस के माथे पर क्यो फोडा जाता है. .?
4) जब एक हि नस्ल कि कई जातीय अलग अलग राज्यो मे विभीन्न जाती के रुप मे तो. ... नस्ल कि बाते नहि कर के जाती का जुमला क्यो फैलाया जाता है. ..?

Note- प्राचिन भारत मे अप्रवासी के आने से धीरे धीरे जाती का निर्माण हुआ. ... मध्य भारत मे टकराव के कारण उत्तपादन ऒैर व्यवास का बटवारा हुआ. . ऒैर नवीन भारत मे जाती प्रमाण पत्र निर्गत कर इसे रुढ बना दिया गया 🙏🏻 k k lal

Wednesday, 19 August 2020

खोखर गोत्र का पाया जाना धोबी जाती मे

*हमारे कई ऊपनामो मे एक ऊपनाम "खलिफा" भी है ॥ हम लोगो के टायटल रजक, बैठा, परदेशी होते हुए भी लोग धोबी बोलते थे उसी तरह खलिफा बोले जाने का भी रिवाज है ॥ जिस प्रकार हमारे टायटल -रजक, साफी पारसी भाषा के शब्द है वहि खलिफा भी अरबी शब्द है ॥

खलिफा सुन्नी समुदाय के लोगो का ऊपनाम है ॥

पंजाबी धोबी या पंजाब के धोबीयो के गोत्र खुखरान,  खत्तरी है ऒैर  अपने को राजा *खोखर* का वंशज मानते है ॥

खोखर ईराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का भी गोत्र था ॥ ..... १२०६ में आधुनिक पाकिस्तान के झेलम क्षेत्र में नदी के किनारे मुहम्मद ग़ोरी को खोखर नामक  क़बीले के लोगों ने अपने ऊपर हुए हमलों का बदला लेने के लिए मार डाला। और खोखर कबीला वोही है जिससे सद्दाम हुसैन भी आते थे | इसलिए यह कहना की धर्म का सम्बन्ध कबीलों से है सर्वथा गलत है | बल्कि आपकी पहचान धर्म से नहीं आपके गौरवशाली कबीले से होती है | स्थान बदले है नस्ले नहि बदला करती है ॥ वहि नाक, आॅख, कद काठी ॥ नस्ल हि सर्वोपरी है ॥..... note- सद्दाम भी सुन्नी मुसलमान हि थे ॥

Sunday, 2 August 2020

प्रीस्ट किंग एक रजक

प्रीस्ट किंग एक रजक. ....

पीस्ट किंग. .. सिन्धु सभ्यता मे मिले इस मुर्ति का नान पीस्ट किंग रखा गया. ..पता नहि क्यो? ...
1) हमारे यहाॅ एक किंवदती है *नाग मनी* कि  जो सांपो के सर पर होना बताया जाता है जो वास्तविकता मे मिथ्य बाते है ॥ पर इस मुर्ति मे सर पर बने गोल चक्र इस बात का सबुुत है कि इस स्थान पर कोई रत्ण,मणि रहा होगा जो अनेक व्यक्ति मे श्रेष्ठ, विशिष्ट  बनाता है ऒैर ये नागवंशी होने का प्रमाण है ॥ ...
2) संतसिरोमणी शब्द के आशय से पता चलता है वैसे संत जिस के सर मणी हो ॥. .... संत सिरोमणी शब्द को अगर मुर्त रुप देंगे तो यहि प्रिस्ट किंग कि मुर्ति बनेगी ॥ . ... शिरोमणी का अर्थ श्रेष्ट होता है जो रजक के टायटल शेटी  से मिलता है ॥
2) सिन्धु सभ्यता मे रंग के कपडे ऒैर कपडे रंगे जाने वाले गढ्ढे का प्रमाण मिला है इस लिये कुछ विद्वान सिन्धु सभ्यता का नाम शुद्धेरंजोदडो रखा है ॥. .
3) इस के तन पर जो चिवर है उस फुल अंकित है जो मजीठा के फुल को प्रद्रशित करता है जिस से प्राचीनकाल मे कपडे रंगे जाते थे ॥
4)प्रीस्ट किंग अर्थात पुरोहित राजा का सटिक नाम रजक होना चाहिये क्यो कि सिंधु सभ्यता के प्रशान व्यवस्था धम्म गुरु या पुरोहितो के हाथ मे थी ॥ सम्राट अशोक के रज्जुक संघ (रजक के ) के हाथो मे प्रशासन कि बाग डोर थी ॥. .......... ..
5)प्रो नवल वियोगी ने रजको को नाग वंश का माना है  जो नागो के सर मणि कि बात को सार्थक करता है . . उपरोक्त तिनो बातो पर ध्यान देने पर पाते है कि ये *रजक* कि प्रतिमा है. ..
..........................इस बात को सार्थक रजक का वेदो पुरानो मे अर्थ ढुढने पर पाते है कि रजक उसे कहा जाता था जो अनेक व्यक्ति मे चमकने वाला व्यक्ति जिस मे राजा होने का ऒैचित्य सिद्ध हो ऒैर जो सामरिक, बोद्धिक, भावनात्क गुणो के आधार पर चमकता है ॥. फारसी मे भी रजक का अर्थ रोजी, रोटी देने वाला बताया गया है.  *उपरोक्त तथ्य सावित करता है कि ये रजक कि प्रतिमा है ॥. .. k k lal