Wednesday, 10 March 2021

पुष्यमित्र शुंग पुर्व बुद्ध के वाहक

गॊैतम बुद्ध ने बलि प्रथा को खत्म किया था पुर्व बुद्ध के समय बलि प्रथा थी जो सैधव सभ्यता से चलती आ रहि थी. ........  शुंग भी बोद्ध हि थे बस वो पुर्व बुद्ध के विचारो के वाहक थे इस लिये बलि प्रथा को चालु कराया था लेकिन यज्ञ हवन बाद मे आर्यो ने घुसेड कर अपने को स्थापित किया. ..............................सैधव सभ्ता कि मातृ देवी ऒैर पुष्यमित्र शुंग मे समानता से पता चलता है कि शुंग पुर्व बुद्ध के वाहक थे. ...

शुंग ब्राह्मण होता तो जनऊ जरुर पहनता. ..
शुंग ब्राह्मण होता तो मंदिर बनाता लेकिन भरतहुत, सांची के स्तुप बनाये थे. ... शुंग काल मे एक भी मंदिर नहि बना था ॥ किशन कुमार लाल🌹

राजपुत के उतपत्ति सिद्धांत

करवा चॊथ एक पुर्वतः बोद्धो का त्योहार रहा है. ..ये धोबीयो के द्वारा सुरु किया गया पर्व है. ........

 चलिये आप के अपने रिसर्च का कुछ अंश समझाता हुँ. .....

करवा ब्रह्मवर्तपुरान मे वर्णित एक पात्र है जो धोबीन है. .....जो अपने पति कि रक्षा मगर से करती है ....यहि से करवा चॊथ पर्व मनाया जाने लगा. .......
....करवाचॊथ को तोडे = कर +व+ चॊथ
कर का अर्थ बाजु भुजा होता है जो शक्ति के प्रतिक माना गया (वर्ण व्यवस्था का क्षत्रिय)

चॊथ = चॊथ का अर्थ होता है चॊथा अंश अर्थात चॊथा पुत्र
अब समझे. ... वर्ण व्यवस्था का चॊथा पुत्र कर (भुजा =क्षत्रिय = राजपुत)

इस लिये कहा जाता है करवा चॊथ राजपुतो के घर से निकली हुई प्ररंपरा है. ..... ये वास्तविक मे रजक पुत है. .........🌹k k lal🌹

Monday, 8 March 2021

धोबी की बेटी ऒैर वोट केवल धोबी को*

*समाज को संदेश  ** 
 *धोबी की बेटी ऒैर वोट केवल धोबी को** 

बात सुल्तानगंज जिला भागलपुर, बिहार की है, जहां सतीश रजक ,(04.01.1939_19.04.1994) मुख्य वाणिज्य इंस्पेक्टर (अधिकारी), उत्तर पूर्वोत्तर रेलवे, कटिहार मे कार्यरत् थे। सेवारत रहते हुए समाज की सेवा के लिये रजक सुधार समिति सुलतानगंज के सचिव के  रुप मे कार्य करते रहते थे।  हर महीने अवकाश लेकर , इस मीटिंग में शरीक होते और लोगों को जोड़कर जागरूक बनाते रहते थे। इनकी लगन और जागरूकता ने धोबी समाज को अपने कल्याण के लिये बहुत सारी जानकारी हासिल करवाया । ब्लॉक से सरकारी फंड तक की जानकारी लेते और भागदौड़ कर उन कल्याणार्थ को इन अशिक्षित और गरीब धोबी समाज तक पहुंचाने का काम करते। इनकी सुविधा के लिये सरकारी अनुदान के रुप में ब्लीचिंग पाॅउडर, वाशिंग पाउडर, साबुन तक कंट्रोल रेट में उपलब्द्ध कराते थे । इन महापुरुष कि भविष्य दृष्टि ऒैर समाज के लिये किये गये कार्य आज के परिवेश में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितने 1970-80 दशक के समय थी ॥ इनके कई संदेशो में एक समाज के नाम दूरगामी संदेश कई मायनों में 21वीं सदी में भी सटिक है *धोबी की बेटी ऒैर वोट सिर्फ धोबी को* ॥ आज के राजनैतिक परिवेश के बिखराव में  धोबी समाज हर राजनीतिक दल कि कठपुतली बनकर रह गई है। इसी राजनैतिक दूरदृष्टि को ये महापुरुष 70 के दशक में ही समझ गये थे, इसलिये यह संदेश  हर सभा में जरुर लोगों के बीच रखते थे। ये संदेश इसलिये बहुत ही महत्वपूर्ण है कि स्वo सतीश रजक जी  समाज में उत्कृष्ट कार्य के लिये  धोबी समाज में बहुत ही रसूख रखते थे, जिस कारण बहुत से राजनैतिक दल की निगाहों में थे ॥ कई राजनैतिक दल इनके घर पर पैर घिसते नजर आते थे।फिर भी सभी राजनेता को  खाली हाथ ही वापस जाना होता था ॥ इस संबंध मे बहुत हि प्रेरणादायी घटना है कि ..  एक राजनेता स्वo सतीश रजक जी के धोबी समाज के बीच बड़ा रसूख से प्रभावित होकर सर्मथन लेने घर पहुंचे तो उनका स्पष्ट दो टूक जवाब था. .. *आप को मालूम होना चाहिये कि आप  जिस धोबी जाति से सर्मथन लेने आये हैं वो अपनी बेटी ओैर वोट धोबी को ही देते हैं ।*  
           .   *ये वो महापुरुष थे जो अपने स्वार्थ के लिये कभी धोबी समाज से दलाली नहीं की।  उनका मत था कि जिस प्रकार धोबी समाज कि बेटी धोबी समाज कि प्रतिष्ठा होती है उसी प्रकार वोट भी धोबी समाज की प्रतिष्ठा है ॥*  *जिस प्रकार बेटी दूसरे समाज में जाने से पूरे समाज का मान सम्मान गिरता है, उसी प्रकार वोट भी दूसरे समाज में जाने से धोबी समाज का मान सम्मान, प्रतिष्ठा, प्रगति दूसरों के अधीन हो जाता है ॥*

स्वo सतीश रजक जी जगह जगह धोबी समाज में जाकर बैठक कर लोगों की जागृति के लिये प्रयासरत् रहते थे। उन्हीं कुछ विचारों को क्रमबद्ध कर उनके उत्कृष्ट कार्य को आपलोगों के सामने रखने का प्रयास करता हूं..
1) उस समय धोबी समाज कि स्थिति बहुत दयनीय थी इस लिये धोबी समाज के कल्याण के लिये बर्तन, पंडाल, चादर, कम्बल कि व्यवस्था किया करते थे ताकि गरीब धोबी के बेटे, बेटी कि शादी में या अन्य अवसरों में बोझ ज्यादा ना पडे ॥ यह एक सामूहिकता और अपनापन का भी परिचायक था।
2) सभी धोबी को एक उचित दर पर कपड़े धोने के लिये प्रेरित करते थे ताकि आर्थिक रुप से धोबी समाज उन्नत हो सके और व्यवसाय की एकरूपता बनी रहे ॥
3)धोबी समाज के लिये सामूहिक सप्ताहिक अवकाश का प्रयास करते थे ताकि काम के बोझ तले स्वास्थ्य खराब नहीं हो और अपने सगे संबंधियों से मेलजोल कर सकें ॥
4) उनका कहना था कि अपने बच्चों को शिक्षा अवश्य दें ताकि सामाजिक सोपान में आगे बढ़ सकें।
5) संविधान में प्रदत्त कानून को सभी के साथ साझा करते थे और किसी प्रकार की समस्या से निपटने के लिए कानूनी प्रक्रिया की भी सलाह देते थे।

आज स्वo सतीश रजक जी हमारे बीच नहीं रहे पर उनके संदेश ऒैर कार्य आज भी धोबी समाज के लिये प्रेरणाश्रोत हैं।🙏🏻

🌹किशन कुमार लाल(बंटी रजक)🌹
Mob no- 9852003692

Wednesday, 10 February 2021

*जाति के बीमार समाज विज्ञान से मुक्ति* part - 2

Part 2

*जाति के बीमार समाज विज्ञान से मुक्ति*

 अम्बेडकरवाद - दलितवाद  एक विचार का सूक्ष्म  खांचा है जिससे प्रभावित हो कर अनुसूचित जाति/जनजाति और अति पिछड़ी जातियां  अपने पुस्तैनी व्यवसाय को हीन दृष्टि से  देखने लगता है ऒैर इसमें रोजगार, आर्थिक उन्नति के अवसर खो देता है। यहि कारण है कि दलित, अम्बेडकरवाद को एक बीमार समाज विज्ञान कहने कि जहमत ऊठा पाया. ....
  आप दलित साहित्य या अम्बेडकर साहित्य पढ़ें, सारे तथ्यों पर गहराई से अध्ययन करे तो एक ही बात निकल कर आती है कि आप कि दुर्गति का कारण आप का गंदा व्यवसायिक पेशा रहा है....
 कहीं कोई जिक्र नहीं है कि आप के व्यवसायिक पेशा, व्यवसाय  आज बड़े- बड़े औद्योगिक रुप ले लिया है ऒैर इसका सलाना का कुल बिक्री करोड़ों में है ऒैर इस के मालिक वही सवर्ण समाज के लोग हैं जो इस व्यवसाय को लेकर आप पर व्यंग्यात्मक टिपण्णी करते थे ॥
 अपने पुश्तैनी व्यवसाय को लेकर आप ने कभी आर्थिक अध्ययन नहीं किया ऒैर ना दलितवाद अर्थात अम्बेडकरवाद आप को बताया ॥
💫: अपने कभी समझने कि कोशिश नहीं कि --
कोई रोजगार छोटा- बड़ा नहीं होता है. ...
छोटा- बड़ा हमारी सोच होती है. .......
हम अपने लगन, मेहनत के दम पर हर क्षेत्र में कामयाब हो सकते हैं. .........

सोचें, अगर -- चमार अगर चमरे के रोजगार को छोटा, घृणास्पद नहीं मानता तो -- बाटा, रिबोक,  श्रेीलेदर. जैसे ब्राण्ड के मालिक होते. ...।

नाई अपने व्यवसाय से प्यार करता तो आज सारे ब्यूटी प्रोडक्ट के मालिक होते।

तेली - अगर अपने तेल के रोजगार को हीन दृष्टि से नहीं देखता तो सारे तेल कम्पनी के मालिक तेली होते. . जैनी मारवाड़ी नहीं. ..

उसी प्रकार, अगर हम धोबी पेशा को घृणास्पद नहीं मानते ऒैर इस प्रोफेशन से प्यार करते तो सारे कलर(रंग) कि फैक्ट्री,  सर्फ, सोडा,  साबुन की जितनी भी फैक्ट्रियाँ ऒैर कम्पनियां हैं, हमारी होती । 
....... इसलिये जाति के सांचे से बाहर निकल कर पुश्तैनी व्यवसाय को व्यापार कि दृष्टि से समग्रता में देखने का प्रयास करें. ...

🌹किशन कमार लाल🌹
Mob no - 8918519132

दलितवाद - अम्बेडकरवाद एक बीमार समाज विज्ञान* part -1

Part - 1

 *दलितवाद - अम्बेडकरवाद एक बीमार समाज विज्ञान* 

कोईरी-कुर्मी , लोहार, सोनार, तेली, पासी, बढ़ई , धोबी,नाई, खटिक , चमार,भंगी, ग्वाला, गङेरिया-गौरया , कायस्थ एक पेशा था जाति नहीं ! 

हर समय-काल में  पेशेगत-वर्गीय विशेष पर टिपण्णी स्वाभविक थी । हरेक व्यवसाय का अपना एक चरित्र भी  होता है, और उससे जुड़ी टिपण्णी-व्यंग्य भी होती है ।

आज भी दारोगा, चपरासी , डाक्टर , नेता , नौकरशाही  पर अपमानजनक पेशेगत टिपण्णी व्यंग्य उपलब्ध है ।

आपके मूल जाति-ब्लड लाइन पर कोई टिपण्णी नहीं कर रहा था इसलिए बहुत ज्यादा अपमान की पीड़ा से व्यथित होने की आवश्यकता नहीं थी ।

आपने यदि अपमान की पीड़ा से समाजशास्त्र  पढ़ना शुरू कर दिया तो समाजिक विज्ञान फिर  बीमार विज्ञान बन जाता है ।

"दलितवाद-अम्बेडकरवाद"  उसी बीमार विज्ञान का नाम है ।

आपको सिर्फ दो बातें गौर करनी है ।

1) हर पेशे-वर्ग में नस्लीय विविधता कितनी है ? क्या अपमानजनक टिपण्णी की वजह नस्लीय समझ थी या वर्गीय ?

2) दूसरी यदि हम  पेशेगत समाजिक संरचना  को अपमानित कर रहे थे तो हम कहीं ना कहीं , भारत को  ही तो कमजोर कर रहे थे और किया भी हमने ।

Wednesday, 16 September 2020

रज्जुक संघ के धोबी

साज श्रृगार रुप देख कर रानी कि तरह, ,, पर सर पे पोटरी (गठरी) विस्मय मे डाल देती है ॥ जैसे कोई रानी अपने प्रजा जनो के लिये महलो को छोड उनकि सेवा के लिये जा रहि हो ॥  जैसे बता रहा हो प्रजा कि सेवा सर्वोतम सेवा ॥ एक श्रवण संस्कृती मे ना कोई राजा रानी, ,, सभी समान ॥ आज इस कुल को क्या बना दिया गया, ,,, खुद मे झाक कर देखे क्या थे क्या बन गये ॥ पर कुछ इस संस्कृती के विरोधी भेडिये आप को क्या बना दिये, ,,,? ??🌹सम्राट अशोक द्वारा बनाये गये रज्जुक संघो के कार्य निष्टा पुर्वक पुरी इमानदारी से  रजक(धोबी) आज तक कर रहे है ॥देखे अशोक ने कलिंग में कहा , “सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय को सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है ॥ *रजक(धोबी) आज भी सारे प्रजा को ना जाती ना धर्म देख कर अपने संतान कि तरह सेवा कर रहै ॥*🙏🏻....... किशन लाल🌹

Saturday, 5 September 2020

जाती कि उत्पत्ति सिद्धांत

*जातीवाद कैसे खत्म किया जा सकता है*?
आज हर बुद्धिजीवी जातीवाद खत्म करने कि बात करता है पर किसी के पास इसको खत्म करने कि सटिक ऊपाय नहि है. ... इस जातीवाद को खत्म करने का ऊपाय के रुप मे आरक्षण कार्ड खेला गया. .. क्या ये कारकर हो पाया? ??? जवाब है नहि ॥
..... आरक्षण को लेकर ऊल्टा हि हुआ जातीवाद नये रुप सर्वण वर्ग  एक जुट हो गये. ... यहाँ तक हुआ कि वर्ण सिद्धांत के सब से निचले वर्ग सुद्र (obc) भी अंत्यज वर्ग (sc) के खिलाफ हो गया ॥

लेकिन हमारा व्यक्तिगत अनुभव है कि जातीवाद खत्म तभी हो सकता है जब अंत्यज वर्ग जातीवाद के खिलाफ अपने जातीय इतिहास को मजबुत कर किया जा सकता है. .... ताकि कोई भी अपने जाती को लेकर हिन भावना नहि पालेगा ऊलट जाती को लेकर गर्व महसुस होगा ॥ भरी सभा मे अपने जाती का गुणगान, गॊैरव, का वखान कर सकते है. ... तब अन्य सर्वण समाज आप के इतिहास के सामने टिक नहि पायेगा. .. अपने मिथ्य साहित्य पर दंभ भरते सर्वण समाज का महल तास के पत्ते से बना महल आप के जातिय इतिहास के सामने भर-भरा के विखर जायेगा 🙏🏻
1) जातिय इतिहास से आप के बच्चो मे आत्म सम्मान, आत्म गोैरव कि भावना का विकास होगा ॥
2) आप के बच्चे जाती के कारण कुठा ग्रस्त नहि होगा ॥
3) आप के बच्चो का सार्वागिय विकास करेगा वो अपने ऎतिहासिक पुरुष से प्रेरणा पा कर उस कि तरह बनने कि सोचेगा ऒैर बनेगा
4) जाती तोडने के बजाय जाती मजबुत इस तरह से करने से सर्वण समाज का मिथ्य गॊैरव कांच के महल कि तरह चकना चुर हो जायेगा. .. बस एक पत्तथर  तवियत से तो उछाले ॥
5 ) .... जय धोबी वंश के कुल गॊैरव सम्राट अशोक कि जय 🌞󾴇स तरह के स्लोगन का निर्माण करे. ........ इतिहास लेखन हि अपने जातीय व्रचस्व को बनाये रखने के लिये किया जाता रहा है एक बार धोबी समाज करे. ...🙏🏻

🌞किशन कुमार लाल🌞